मैं फिर आऊँगा

मैं फिर आऊँगा
जब तुम्हें मेरी ज़रूरत होगी

दर्द का एहसास
मुझे भी होता है
मेरे सीने से भी चीख निकलती है
आँखो के पर्दे फाड़ दे
इतनी तेज
लेकिन तुम तो बहरो
के नगर के राजा हो
तुम्हें कैसे सुनाई देती

तुम्हें महसूस होता है
जब वार हो
तुम्हारी दौलत पर
इकट्ठा किया है जिसको
तुमने ग़रीबी के खून बहा कर
जिससे बू आती है
उन लाशों की
जो तुम्हारी दौलत की इमारतों
को बनाते दब गए
हम ‘शहीद’ कभी नहीं होते
तुम्हारी परिभाषा
मौत की अजीब है

मुझको जकड़ के रखा है
भूख और बदहाली के ज़ंजीरों में
फिर से आना पड़ेगा
भूख मिटाने
बदहाली मिटाने

मैं फिर आऊँगा
ज़ंजीरों को
अपनी भूख की भट्टी में पिघलाने
तुमको दिखाने
तपते हुए लोहे में
कितना दम होता है
तुम समझोगे तब
हम बेसहारा बेबस नहीं
कि
तुम्हारी यातनाओं ने ही
जन्म दिया एक क्रांति को
जो इतिहास में अभूतपूर्व नहीं होगा

20th April 2020

We do not walk alone

Walking not alone
But with innumerable others
Talking occasionally
Of where we were
And where we will be
Whether we will also perish
Like the one
whose body could not carry him for long
Like those young lives
Which were lost in transit

I don’t walk alone
I walk with my comrades
All of us enslaved
by the shimmer of cities
by false hopes of a better life
by the wicked king
who hypnotised
us with his rhetoric
of religion, nation and friendship

Why do we,
Who built those penthouses
Those iconic metros
Those beautiful gardens
Nurtured those flowers
Brought ‘life’
to the emaciated, lifeless urban life,
Have to run away
Hungry, diseased, unsure and impoverished

We are not alone
Look at the roads
The buses and trains
Our number
Generates fear among Them
They beg us to stay back
For who would
Deliver them their lives
Who would stand quiet
Like lifeless slaves while the master shouts
Who would service their existence

The spring will again come
Not with us walking like this
The Gulmohar will blossom
With the bright Amaltas
Along those streets
Which we built
The sun will not take our lives
Sucking every bit of whatever is left within us
That Spring will be brought by us
By our refusal to work
Refusal to be led
Refusal to be oppressed
Refusal to be silent

1st May 2020

पतझड़ से उम्मीदों का जन्म

पतझड़ के मौसम ने रंग दिया इन सड़कों को
अरसों के बाद, बरसों के बाद
पत्तों को इतनी शांति से
सड़कों पर सोते देखा
किसी ने रौंदने की जुर्रत नहीं की
किसी ने उन्हें बेज़ुबान नहीं समझा
और अनचाहे रिश्तों की तरह
दरकीनार नहीं किया
कौन कहता है पेड़ों से जुदा होकर
उनकी हुस्न में कमी आयी हो
कौन कहता है उनकी दास्तान
अनचाहे रिश्तों की तरह है

उनकी जुदाई उन डालों से
एक नयी उमंग के साथ
एक नए कल के लिए
एक नयी दुनिया की तसव्वुर के साथ
होते हुए मैंने देखा बरसों के बाद

नयी कोंपलें फूटी
नए पत्ते निकले
नयी ज़िंदगी, नयी उम्मीदें
पतझड़ के बाद ही आयी
सड़कों पर बैठे, चलते, उड़ते
उन गुजरी हुई दास्तानो ने
नयी दुनिया की नक़्शे को
बनाने की उमीद जगायी

11th April 2020